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Book Recommendations 2022: “द स्ट्रगल फॉर पुलिस रिफॉर्म्स इन इंडिया: रूलर पुलिस टू पीपल्स पुलिस”

Book Recommendations 2022: उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ( Former DGP Prakash Singh ) ने "द स्ट्रगल फॉर पुलिस रिफॉर्म्स इन इंडिया: रूलर पुलिस टू पीपल्स पुलिस" ( The Struggle for Police Reforms in India: Ruler’s Police to People’s Police ) किताब को लिखा है।

Book Recommendations 2022: उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ( Former DGP Prakash Singh ) ने “द स्ट्रगल फॉर पुलिस रिफॉर्म्स इन इंडिया: रूलर पुलिस टू पीपल्स पुलिस” ( The Struggle for Police Reforms in India: Ruler’s Police to People’s Police ) किताब को लिखा है। इस किताब का विमोचन उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ( M. Venkaiah Naidu ) ने 11 मई 2022 को दिल्ली में किया था। यह किताब भारत में पुलिस इतिहास, काम-काज, कानून, समस्या, बदलाव आदि मुद्दों को लेकर लिखी गई है। इस किताब में आपको कानून, राजनीति सभी स्तंभों का पुलिस के कामकाज के संदर्भ में एक असल चेहरा दिखाया गया है। साथ ही इसमें सुप्रीम कोर्ट के उन दिशानिर्देशों का भा जिक्र किया गया है, जिसपर अभी तक राज्य और केंद्र की सरकारें खामोश हैं।

“द स्ट्रगल फॉर पुलिस रिफॉर्म्स इन इंडिया: रूलर पुलिस टू पीपल्स पुलिस” किताब के बारे में –

किताब: “द स्ट्रगल फॉर पुलिस रिफॉर्म्स इन इंडिया: रूलर पुलिस टू पीपल्स पुलिस” ( The Struggle for Police Reforms in India: Ruler’s Police to People’s Police )
लेखक: पूर्व डीजीपी उत्तर प्रदेश प्रकाश सिंह ( Former UP DGP Prakash Singh )
प्रकाशन: रूपा प्रकाशन ( Roopa Publication )
कुल पृष्ठ: 432
अधिकतम कीमत: 795 रुपये
प्रकार: काल्पनिक ( Fiction )

“द स्ट्रगल फॉर पुलिस रिफॉर्म्स इन इंडिया: रूलर पुलिस टू पीपल्स पुलिस” किताब का केंद्र बिंदू –

यूपी के पूर्व डीजीपी, प्रकाश सिंह, इस किताब में अकेले योद्धा जोकि पिछले 25 साल के लंबे संघर्ष के बाद सफलता हासिल करने के बाद उसकी राह देख रहे हैं। यह किताब ऐसे धर्मयुद्ध का एक विस्तृत विवरण है, जिसमें पुलिस सुधारों की आवश्यकता, इतिहास के माध्यम से की गई पहल, प्रयासों की सीमित सफलता और पुलिस पर अपना दबदबा छोड़ने के लिए पार्टी लाइनों में सरकारों की अनिच्छा को दर्शाया गया है।

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इस किताब का केंद्र बिंदू भारत में पुलिस व्यवस्था का एक संक्षिप्त इतिहास है। इस किताब में कई जनहित याचिका में दुर्व्यवहार और पक्षपात के वास्तविक जीवन के उदाहरणों के साथ तर्क दिया गया है। 2006 में कोर्ट की तरफ से पुलिस सुधार पर एक बड़ा फैसला आया। इसने राज्यों को तबादलों, पोस्टिंग और पदोन्नति के लिए पुलिस और स्थापना बोर्डों के स्वतंत्र कामकाज के लिए द्विदलीय राज्य सुरक्षा आयोगों का गठन करने का निर्देश दिया। निर्देशों में पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन और जांच के लिए एक अलग विंग शामिल करने की बात कही गई। साथ ही अनुचित राजनीतिक दबावों का विरोध करने और केंद्रीय बलों के प्रमुखों के चयन के लिए एक आयोग के गठन के लिए परिचालन पुलिस प्रमुखों के निश्चित कार्यकाल का भी आदेश दिया गया।

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1996 में सुप्रीम कोर्ट में पूर्व डीजीपी उत्तर प्रदेश प्रकाश सिंह की याचिका दायर करने के बीच के समय में अब तक क्या हुआ, इस पर दिलचस्प किस्सों से यह किताब भरी पड़ी है। इस किताब में प्रकाश सिंह, कल्याण सिंह सरकार के दौरान राम मंदिर आंदोलन के चरम पर यूपी डीजीपी के रूप में हटाए जाने की कहानी भी सुनाते हैं। उनका कहना है कि उन्हें इसलिए हटा दिया गया क्योंकि उन्होंने विवादित स्थल के आसपास पुलिस की मौजूदगी को कम करने से इनकार कर दिया था। दिलचस्प बात यह है कि बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद उन्हें राज्य के डीजीपी के रूप में वापस लाया गया था।

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इस किताब में दिखाया गया है कि कैसे पुलिस में बेहिसाब लोगों को राजनीतिक वर्ग का समर्थन प्राप्त है और अदालत के महत्वपूर्ण आदेश को अक्षरश: लागू क्यों नहीं किया जाता है। और यही कारण है कि पुलिस सुधारों को अदालतों या नीति निर्माताओं पर छोड़ने के बजाय अब आम जनता को भी इसके लिए आवाज बुलंद करनी चाहिए।

इस किताब को ऐसे व्यक्ति जरुर पढ़ें –

भारत में पुलिस सुधारों में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह पुस्तक जरुर ही पढ़नी चाहिए। इसमें पत्रकार, वकील, पुलिस आदि वर्ग शामिल हो सकता है। क्योंकि यह किताब वह माध्यम है जोकि वर्तमान समय में पुलिस के पैरों में बंधी बेडियों को कैसे खोला जाए, कि बात करती है।

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